पटना — बिहार की राजनीति में राजद परिवार हमेशा चर्चा में रहता है, लेकिन इस बार सुर्खियों में हैं लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्या, जिन्होंने एक कॉल रिकॉर्डिंग वीडियो साझा कर समाज की एक गहरी विडंबना पर सवाल उठा दिया। वीडियो में रोहिणी वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी से सवाल करती हैं: “बेटियों को अपने पीहर कितने दिनों तक रहना चाहिए?” यह सवाल यूं ही नहीं आया — दरअसल भेलारी ने अपने एक वीडियो में कहा था कि रोहिणी “मायके में कुंडली मार कर बैठ गई हैं”, और बेटियों को ज्यादा दिन मायके में नहीं रहना चाहिए।

व्यक्तिगत जीवन पर सार्वजनिक टिप्पणी?
रोहिणी का जवाब सिर्फ एक निजी प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक सामाजिक प्रतिरोध है। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा न तो राजनीतिक है, न ही सामाजिक — बल्कि यह हमारे समाज की विकृत मानसिकता का उदाहरण है, जिसमें बेटियों के मायके में रहने को लेकर सवाल उठाए जाते हैं।
रूढ़िवादिता बनाम आधुनिकता
भारतीय समाज में आज भी यह धारणा है कि “बेटी पराए घर की होती है”, और शादी के बाद उसका मायका सिर्फ एक अस्थायी ठिकाना रह जाता है। सवाल उठता है — क्या एक बेटी अपने मां-बाप के पास जितने दिन चाहे रह नहीं सकती?ग्रामीण से लेकर शहरी परिवेश तक, यह सोच दौड़ती रहती है: “इतने दिन से मायके में है, ससुराल में सब ठीक है ना?”यह सोच हर वर्ग की महिलाओं को प्रभावित करती है — चाहे वो अमीर हों या गरीब।
संचार के युग में भी रिश्तों की दूरी
आज मोबाइल और इंटरनेट के युग में भी बेटियों के मायके आने-जाने पर पाबंदियां हैं। 40–50 साल पहले की महिलाओं की व्यथा तो और भी गहरी थी — कम साक्षरता, बाल विवाह, सीमित संचार साधन और सामाजिक बंधन।

रोहिणी आचार्या का सवाल सिर्फ उनका नहीं — यह हर उस बेटी की आवाज़ है जो अपने मां-बाप के घर को सिर्फ एक ‘बीता हुआ पड़ाव’ नहीं मानती।
उनका मायका, उनका बचपन, उनका भावनात्मक आधार है — और उस पर सवाल उठाना संवेदनहीनता है।
समाज को सोच बदलनी होगी
कन्हैया भेलारी जैसे लोग भले ही रूढ़िवादिता की जंजीरों में जकड़े रहें, लेकिन आने वाली पीढ़ी इन सोचों को पीछे छोड़ रही है।
समाज को अब यह समझना होगा कि पारिवारिक सामंजस्य का मतलब नियंत्रण नहीं, बल्कि सम्मान और स्वतंत्रता है।
संपादकीय टिप्पणी (Editorial Note)
“बेटी का पीहर कोई किराए का ठिकाना नहीं”
समाज को यह समझना होगा कि बेटियों का मायका सिर्फ एक भावनात्मक रिश्ता नहीं, बल्कि उनका अधिकार है। जब एक महिला अपने ससुराल, करियर और बच्चों को संभाल सकती है, तो अपने मां-बाप के घर कुछ दिन रहना क्यों सवाल बन जाता है?
कन्हैया भेलारी जैसे वक्तव्य समाज को पीछे ले जाते हैं, जबकि रोहिणी आचार्या जैसे सवाल हमें सोचने पर मजबूर करते हैं।
अब वक्त है कि हम रूढ़ियों को तोड़ें और बेटियों को उनका पूरा सम्मान दें — मायके में भी, समाज में भी।
